क्या सरकारें हमसे हमारे मूल अधिकार छीन रही हैं । Depleting Fundamental Right

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लोकतंत्र में सरकारे जनता के द्वारा चुनी जाती है ,ऐसी व्यवस्था मे जनता सर्वोच्च स्थान पर होती है , सही सरकारो को चुनना हमारी पहली प्राथमिकता होती है जिसे हम सबसे गैर जिम्मेदार तरीक़े से करते हैं । कोइ नृप होइ हमय का हानी, इस आशय से हम वोट देते हैं तो चेरी छोड़ न होबै रानी का लक्ष्य सरकार पूरा कर देती है, फिर तो मूल अधिकार दूर की बात हो जाती है।

अभी हाल में सरकार ने sc/st act मे कुछ संशोधन किया है ,जिसमें एक विशेष वर्ग के लिए एक वर्ग के मूल अधिकारो का गला घोंट दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की भी बात नहीं मानी गयी ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि सरकार को अपने सर्वोच्च न्यायालय पर विश्वास नहीं है क्योंकि उससे सरकार का राजनीतिक हित नहीं पूरा होता ,जबकि जनता अब भी सबसे ज्यादा न्यायालय पर भरोसा करतीहै।आप को किसी फर्जी F.I.R के कारण आप की बात सुने बगैर जेल में बंद कर दिया जाय तो आप को क्या लगेगा ? हम असभ्य समाज मे जी रहे हैं । कारण वोट बैंक और किसी तरह सत्ता में बने रहने की आकांक्षा यदि इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी कर के संविधान संशोधन होता रहा तो एक दिन हम संविधान के मूल रूप को खो देगें, आज जातिगत आरक्षण को लेकर जो खेल हो रहा है वो देश को निश्चित रूप से विभाजन की तरफ ले जा रहा है

अवसर की समानता से वंचित लोग संविधान और देश पर कितने दिन गर्व महसूस करेंगे कभी न कभी स्थिति विस्फोटक होनी ही है, आश्चर्यजनक रूप से प्रतिभा एवं योग्यता को दबाया जा रहा है।यह निश्चित रूप से अन्याय है इसका प्रतिकार होना चाहिए । एक तरफ हम विश्वगुरू होने का सपना देखते हैं और दूसरी तरफ समाज को कबीलों मे बाँटते हैं क्या इसी तरह हम विश्वगुरू बनेंगे।हमे शर्म भी नहीं आती गरीब निर्दोष लोग जेल में पड़े रहते हैं और देशद्रोही आतंकियो के लिए रात में कोर्ट खुलता है। मुस्लिम महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हो रहा है , शाहबानो केश मे सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अध्यादेश लाकर इसलिए पलट दिया जाता है कि मुस्लिम समुदाय के मौलवी .लोगों को पसंद नहीं था वोट बैंक टूटने का डर था। तो बना दिया महिलाओं को अभिशप्त और विवश जीवन जीने का कानून इन्हें शर्म भी नही आती आपको वोट के शोर में महिलाओं का रुदन नही सुनाई देगा ,सामाजिक न्याय होना चाहिए हर वर्ग के लोगों को सुरक्षा न्याय और समान अधिकार मिलने चाहिए ,कहाँ गया समान नागरिक संहिता का कानून शायद ही ये अभी धरातल पर आये क्योंकि सारे नियम कानून वोट बैंक को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं तो ऐसे में जनता को न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम आदिम युग की तरफ बढ़ रहे हैं।

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Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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1 Response

  1. Flo Bayer says:

    I couldn’t resist commenting

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