सरकारों की जवाबदेही जनता के प्रति या जनप्रतिनिधियों के ?

सरकारों के द्वारा लिए गये निर्णय यदि देश एवं जनता के हित मेंं नहीं तो उसे सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए । सरकारों की जवाबदेही उसे चुनने वाली जनता के प्रति होनी चाहिए न कि जनप्रतिनिधियों के प्रति ।

सरकार ने जनवरी 2004 के बाद नियुक्त सभी सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन योजना को इस आशय से बंद कर दिया गया कि कर्मचारियों की पेंशन देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन रही है, बजट का एक बड़ा भाग पेंशन मेंं खर्च हो जाता है, इस बजट को बचाकर सरकार जनकल्याण की योजनाओं में लगा सकती है – सोच बहुत अच्छी थी – कर्मचारियों को नई पेंशन योजना से जोड़ दिया गया जहाँ सेवानिवृत्ति के बाद क्या कुछ मिलना है सब अनिश्चित, इस प्रकार बुजुर्गों को अनिश्चितता के गर्त मेंं धकेलने वाली सरकार जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते मेंं तथा पेंशन मेंं बेतहाशा वृद्धि करती है, अल्प समय के लिए बने विधायक जी की अजीवन पेंशन सुनिश्चित । यहां यह नहीं स्पष्ट होता कि राजनीतिक पद सेवा का पद है या लाभ का, आदर्श स्थिति मे यह सेवा का सम्मानित पद है। जिसे आज बेशर्मी से अनगिनत लाभ लेने वाला पद बना दिया गया है। ऐसी स्थिति मे जनप्रतिनिधियों को सम्मान कौन देगा, हमारी दिशा अघोमुखी होगी।आम जनता AIIMS जैसे संस्थानों मे इलाज के लिए महीनों इतंजार करते रहते हैं,समय से इलाज न मिल पाने के कारण मर भी जाते हैं, माननीयों के लिए कोई वेटिंग लिस्ट नहीं । आपात स्थितियों मे पूरा सरकारी अमला इनकी सुरक्षा एवं व्यवस्था मे , जनता की सुरक्षा ईश्वर के भरोसे , माननीयों के आगमन मे शहर की यातायात व्यवस्था चौपट कर दी जाती है, एम्बुलेंस का मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचना जरूरी नहीं है, माननीय जी का निर्बाध रूप से गन्तव्य तक पहुंचना जरूरी है।

क्या यही लोकतंत्र है जहाँ तंत्र(system) का लोक (people) के प्रति कोई जबावदेही न हो। अतिविशिष्ट की संरक्षण मेंं लोगों का सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार छीन ले। ऐसे में मैं सरकार से यह पूँछना चाहता हूँ कि सरकारों की जबावदेही जनता के प्रति है या जनप्रतिनिधियों के प्रति। कहाँ गया संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार संवैधानिक उपचारों का अधिकार जहाँ संरक्षण के बहाने एक विशेष वर्ग को मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। हम जनतांत्रिक संप्रभु देश को सामंतवाद की तरफ तो नहीं ले जा रहे हैं। जिसमें जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, वंशवाद उर्वरक की तरह काम रहेंं हैं।

यहा गलती हम सभी लोगो की है क्योकि माननीयो को हम लोग ही चुनते है।वे हमारे समाज के प्रतिनिधि है,धर्म क्षेत्र जाति के परे जाकर सही सरकार चुनना हमारी जिम्मेदारी है हम उन्हे अपना देश सौपते है जिसमे हमारे सपने होते हैं, आने वाली पीढ़ियो का भविष्य होता है और हम गैरजिम्मेदार तरीके से या लालचवश अयोग्य लोगो को चुनते हैं तो सरकारो की प्राथमिकताएं बदल ही जायेगी।…..

Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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