सूक्ष्म से अनंत की यात्रा

सृष्टि में जीवन की यात्रा ही सूक्ष्म रूप से ही शुरू होती है, कुछ जीव सूक्ष्म रूप में ही रहते हैं और कुछ विशाल शरीर के लेकिन जीवन की निरंतरता को सभी बना कर रखते हैं,जीवन की विशालता मे सूक्ष्मता निहित है सूक्ष्मता के बिना विशालता संभव नहीं है फिर विशालता का अहंकार क्यों,विशाल मे नहीं सूक्ष्म मे ही सारी अलौकिक शक्तियाँ निहित है।

अणोरणियान महतो,महियान” ।अनंत सूक्ष्म का ही विस्तारित स्वरूप है, हम विशाल का तो दर्शन करते हैं किन्तु सूक्ष्म से परे रहते हैं जिसने सूक्ष्म को संज्ञान में लिया वह अनंत की ओर अग्रसर हो गया,हमारी भी यही दशा है, हमारा शरीर मन एवं विचारों की सूक्ष्म शक्तियों से ही संचालित होता है, हम यह तो जानते हैं कि मन के हारे हार है मन के जीते जीत लेकिन उस मन को जानने का का कभी प्रयास नहीं किया क्योंकि सूक्ष्मता की ओर आकर्षण नहीं है, बाह्य जगत का आकर्षण भीतर झांकने नहीं देता जैसे फलदार वृक्ष को देखकर हम खुश हो जाते है जड़ों की तरफ देखते भी नहीं जबकि वृक्ष के सौंदर्य का आधार जड़ ही है।वही स्थिति हमारी भी ही हम जो कुछ भी है अपने विचारो के कारण है विचारों का उदय चेतना से होता है जिसे हम सभी मन कहते हैं।उसे भी हम नहीं जानते ,चेतना के तीन स्तर जाग्रत (जागने की अवस्था) स्वप्न एवं सुसुप्ति(सोने की अवस्था) से ही पूरा जीवन बिता देते हैं, जीवन का मूल चेतना को जानते ही नहीं हम व्यष्टि थे और व्यष्टि के रूप में मर जाते हैं।जबकि भारतीय दर्शन कहता हैं कि व्यक्ति की चेतना का विस्तार व्यष्टि से समष्टि तक संभव है , जहाँ हमें अपनी अनंत शक्तियों का आभास होता है, पूरा ब्राहमांड एक ही सत्ता का विस्तार लगता है, हम अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कर पाते हैं हम सभी बंधनों से परे हो जाते हैं ।

ऐसा होता नहीं है क्योंकि हम कभी मन की सूक्ष्म गहराइयों में उतरते नहीं है, बाह्य आकर्षण ने इतना संमोहित कर रखा है कि मन की गहराईयों मे उतरने मे भय लगता है । जबकि जीवन का सारा रहस्य वहीं निहित है। मन की सूक्ष्मतम अवस्था में हमें अनंत शांति का अनुभव होता है जिसे तुरीय चेतना कहते हैं यहीं से जाग्रत स्वप्न एवं सुसुप्ति का उद्गम होता है।वहाँ कोई विचार नहीं होता, आनंद की स्थिति होती है ,यदि यही स्थिति जाग्रत स्वप्न एवं सुसुप्ति के साथ बनी रहे तो हम तुरीयातीत अवस्था को प्राप्त करते हैं चेतना में सत् चित् आनंद की स्थिति बनी रहती है, लेकिन इसके लिए जरुरी है स्वयं को देखना .सामान्य जीवन में हमेशा दूसरों को ही देखते हैं दूसरों का गुण दोष देखते देखते स्वयं को देखना भूल जाते हैं तन और मन दोनों मैला कुचैला ही रह जाता है।

जिसने अपने आप को देखना सीख लिया वह अपने भीतर की कलुषिता को क्यों रहने देगा मन की गहन शांति मे ही वह सूक्ष्मतम स्वरुप को देखता है और वहीं उसे अपनी अनंतता का आभास होता है, और यही अनंतता उसे भागवत् चेतना का आभास कराती है उसे द्वैत का अनुभव होता है,और चेतना के सर्वोच्च स्तर पर यह द्वैत भी समाप्त हो जाता है, उसे सर्वत्र एक ही सत्ता दिखाई देती है उसे अपने मे और ईश्वर मे विभेद नहीं दिखता जो कि वास्तव में होता ही नहीं है चेतना के सर्वोच्च स्तर पर व्यक्ति को “अहं ब्रहमास्मि” का अनुभव होता है।

उसे सूक्ष्मतम का दर्शन करते करते कब अनंतता की प्राप्ति हो जाती है पता ही नहीं चलता कि व्यष्टि का समष्टि मे रूपांतरण हो चुका है ऐसी स्थिति में वह सुख और दुःख दोनों से रहित हो जाता है “जानति तुमहिं, तुमहिं होइ जायीं“।यह है शिक्षा का भारतीय वैदिक दर्शन जिसे हम खो चुके हैं।

Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Post comment