स्वच्छता मिशन कितना सफल??

जब तक कूड़ा निस्तारण की ठीक तरह से व्यवस्था नहीं होती है तब तक स्वच्छता अभियान अपने आप मे अधूरा रहेगा ।अभी तो पाश कालोनी का कूड़ा करकट इकट्ठा कर के मलिन बस्तियों के आसपास डम्प कर दिया जाता है । जहाँ सुअर लोटते रहते हैं,कूड़े से निकलने वाली बदबू आसपास के वातावरण को दूषित करती है जहरीले रसायन आसपास के जलस्रोतों को विषाक्त बना रहे हैं,वहाँ की आम जनता बीमार हो रही है जिसे वे नियति समझकर भोग रहे हैं।नदियाँ मल एवं जहरीले रसायन ढोने का साधन हो गई हैं जिससे भूमिगत जल भी दूषित हो रहा है, जल जमीन वायु जिससे हमें जीवन मिलता है वही सबसे अधिक उपेक्षा के शिकार हैं ,हास्पिटल और इन्डस्ट्री से निकलने वाले कचरे को भी सीधे जीवन दायिनी नदियों में डाल रहे है, नदियों में साफ जल से अधिक सीवर का पानी होता है ऐसे में नदियों की स्वच्छता के बारे में हम कैसे सोच सकते हैं,केवल बात कर सकते है क्योंकि हम करनी से अधिक कथनी मे विश्वास करते हैं ,स्वच्छ भारत अभियान में स्टेरिलाइज्ड कूड़े मे झाड़ू फेरने वाले, कैमरे के सामने चेहरा चमकाने वाले शायद ही कभी घर की सफाई किये होगें।आम जनमानस प्रकृति के अधिक निकट होता है अतः प्रदूषण से होने वाले रोगो का शिकार भी अधिक होता है, सम्पन्न लोग और विकसित तथाकथित सभ्य कालोनियां अपना कचरा गरीब लोगों के आसपास स्थानांतरित कर रही हैं, ऐसी स्थिति में हम देश को कैसे साफ सुथरा रख सकते हैं समझ से परे है। कचरा प्रबंधन के लिए जरुरी है, सही न्याय संगय निस्तारण एवं ऐसी आदतें बनाना जिससे कम कचरा उत्पन्न हो एवं वातावरणीय प्रदूषण कम हो हमारी आदतें ही इतनी बदल गई है कि हम बेवजह कूड़ा उत्पन्न करते हैं हम इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि हर सामान छोटे छोटे पैकेट मे रेडी टू यूज होना चाहिए, पाउच कल्चर बेतहाशा कूड़ा उत्पन्न कर रहा है, छोटे छोटे सामानों की पैकिंग इस तरह हो रही है कि अधिक से अधिक कूड़ा उत्पन्न हो रहा है और ये हमारे सभ्य समाज का संस्कार बन गया है, ऐसे में हम स्वच्छ वातावरण की उम्मीद नहीं कर सकते है,स्वच्छता हमारी आदत से गायब हो गई है, अपने घर का कचरा हम पड़ोसी के खाली प्लाट मे डाल कर स्वच्छता मिशन को पूरा कर लेते हैं। गाँवों मे बनने वाले शौचालय इसी तरह की मानसिकता के चलते 99% निष्प्रयोज्य हो गए हैं, हम बेशर्म होकर सड़क किनारे शौच कर सकते हैं किन्तु शौचालय में नहीं जा सकते हैं ऐसे में कमी कहा है .। पान और गुटखा खाकर थूकने वाले स्वच्छता पर उपदेश देते जरूर मिल जायेंगे, हम अपने घर का कूड़ा सड़क पर डालते हैं और यही कूड़ा शाम तक फिर हमारे घर पँहुच जाता है ये है सफाई का अंतहीन सिलसिला जहाँ हम हमेशा शून्य पर रहते है।हमारी सरकारे भी तब तक सोती रहती हैं जब तक समस्या विकराल रूप न ले ले,जो पालीथीन बहुत पहले बंद होनी चाहिए थी आज बंद हो रही है, पाउच और डिस्पोजल कल्चर अभी चल रहा है सार्वजनिक स्थान खाली पाउच और बोतलों से पटे पड़े हैं, पता नहीं सरकार इस पर कब ध्यान देगी, डिस्पोजल कल्चर समाप्त किए बिना हम स्वच्छता मिशन में सफल नहीं हो सकते, इसमें सरकार के साथ साथ जन भागीदारी जरूरी है क्योंकि सभी काम सरकार नहीं कर सकती हैं।सर्व जन हिताय तभी संभव है जब सर्व जन प्रयास हो।

Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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