Biggest thief of India . भारत का सबसे बड़ा चोर ।

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मैं आपको ऐसे ठग के बारे में बताता हूँ जिसके बारे में जानना हमेशा एक रहस्य ही बना रहा क्योंकि उसको जानने वालों की एक के बाद एक संदिग्ध मृत्यु होते चली गई और उसकी स्वयं की मृत्यु पुलिस कस्टडी में बहुत ही संदिग्ध तरीके से हुई । उसका राज हमेशा राज ही बने रहा । भारत का सबसे बड़ा चोर । ये केस था सन 1971 का बहुचर्चित “नागरवाला केस” जिसकी सबसे ज्यादा आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी पर आई थी ।चलिए जानते है उनकी कहानी :

 Biggest thief of India
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नई दिल्ली. तारीख थी 24 मई 1971, गर्मी का मौसम था और दिल्ली वैसे ही काफी गरम रहती है। अखबार के दफ्तरों में बड़ी खबर की कमी की वजह से बोर हो रहे क्राइम रिपोर्टर्स को दिल्ली पुलिस के उनके सूत्रों से फोन आता है कि पार्लियामेंट स्ट्रीट की स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ब्रांच में 60 लाख का डाका पड़ गया है। उस समय 60 लाख बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी । थोड़ी ही देर में बैंक पर मीडिया वालों का जमावड़ा लग चुका था ।पुलिस की टीमें दवाब में थीं । रात 9:45 पर पुलिस ने खुलासा कर दिया कि किसी ने इंदिरा गांधी की आवाज में बैंक के कैशियर को फोन करके 60 लाख रुपयों की ठगी हो गई है ।बहुत जल्द ही वो व्यक्ति गिरफ्तार भी कर लिया गया । उस वक्त तो मीडिया ने पुलिस की ही कहानी छाप दी थी लेकिन हकीकत ये है कि ये केस आज तक सॉल्व नहीं हुआ है और उसका राज उस केस में तीन-चार किरदारों की मौत के साथ ही उनके सीने में दफन हो गया, जिनमें से एक थीं भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी । पुलिस की पूरी कहानी ये थी-

कहानी नई दिल्ली में संसद मार्ग पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खुलने के 45 मिनट बाद शुरू होती है । उस वक्त सीनियर कैशियर वेदप्रकाश मल्होत्रा ही बैंक में मौजूद सबसे बड़े अधिकारी थे । उनके पास पीएम सचिवालय से एक फोन आता है, जो अपना नाम पीएन हक्सर बताता है । हक्सर पीएम के सचिव हुआ करते थे । काफी ताकतवर अधिकारी थे । वो वेदप्रकाश को कहते हैं कि पीएम साहिबा बात करेंगी और दो सेकंड होल्ड के बाद इंदिरा गांधी लाइन पर थीं । इंदिरा वेदप्रकाश से कहती हैं, कि देखो एक सीक्रेट मिशन का केस है, जो ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) से जुड़ा है।दरअसल उन दिनों पाकिस्तान से ईस्ट पाकिस्तान के मुद्दे को लेकर तनातनी चल रही थी और बाद में दिसम्बर में युद्ध भी छिड़ गया था। वेदप्रकाश ने पूछा कि मुझे क्या करना है? इंदिरा गांधी ने कहा कि तुम्हे एक व्यक्ति से मिलना होगा और उसे 60 लाख रुपया देने होंगे । इंदिरा ने उन्हें कोड भी बताया, कि वो व्यक्ति आपसे कहेगा ‘बांग्लादेश का बाबू’, आप कहोगे ‘बार-एट-लॉ’ । उसके बाद उसे पैसे दे देना । “जैसा आप चाहे माता जी ” कहके वेदप्रकाश फोन काट देता है ।

चूंकि इंदिरा गांधी का फोन था, वेदप्रकाश मल्होत्रा ने फौरन बैंक में मौजूद डिप्टी चीफ कैशियर राम प्रकाश बत्रा से कैश बॉक्स में 60 लाख रखने को कहा। एक बैंककर्मी एचआर खन्ना ने बत्रा की मदद की। डिप्टी हैड कैशियर रावल सिंह ने बत्रा से कैश वाउचर मांगा तो उन्होंने कह दिया वेदप्रकाश साइन करके देंगे। पैसा बैंक की ऑफीशियल कार में लाद दिया गया जिसे खुद वेदप्रकाश मल्होत्रा ड्राइव करके ले गए। कार को बैंक से थोड़ा आगे ले जाकर मल्होत्रा ने पार्क कर दिया। वहां उसके पास एक लम्बा गोरा आदमी आया और उनसे वही कोडवर्ड बोला तो मल्होत्रा ने वो रकम उसके हवाले कर दी। दोनों सरदार पटेल मार्ग तक साथ गए फिर वहाँ से वो गोरा व्यक्ति यानी नागरवाला एक टैक्सी में पैसे लादकर चला गया और जाते जाते ये कह गया कि कैश वाउचर के लिए आपको पीएम हाउस जाना पड़ेगा । मल्होत्रा पीएम हाउस पहुंचे तो पता चला कि पीएम तो संसद में हैं। वो संसद पहुंचे तो पीएम से तो मुलाकात नहीं हुई लेकिन स्टाफ ने पीएन हक्सर से बात करवाई । हक्सर चौंके और बताया कि उन्होंने ऐसा कोई फोन नहीं किया, तुम जाकर पुलिस में एफआईआर करवाओ। मल्होत्रा घबरा गए और जाकर एफआईआर दर्ज करवाई ।

पुलिस फौरन एक्शन में आई । उन्होंने एक टीम बनाई जिनमे अस्सिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस डी. के.कश्यप ,इंस्पेक्टर हरिदेव और ए .के. घोष ” शामिल थे और उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए ऑपरेशन तूफान चलाया । पुलिस ने उस टैक्सी वाले को पकड़ा जिसमे नागरवाला ने सबसे पहले सवारी की थी । टैक्सी वाले ने पुलिस को बताया कि नागरवाला को वो डिफेंस कॉलोनी तक ही ले गया था । वहां से नागरवाला दूसरी टैक्सी में गया था। दूसरे टैक्सी वाले से पूछताछ पर यह पता चला कि नागरवाला राजेन्द्र नगर गया था और वहाँ से उसने एक सूटकेस उधार लिया । फिर नागरवाला ने निकोलसन रोड जाके वो सूटकेस स्थानांतरित किया । बाद में उसने वो सूटकेस डिफेंस कॉलोनी में अपने दोस्त के वहाँ रखवाया । उस सूटकेस वाले दोस्त के जरिये पुलिस उस व्यक्ति यानी रुस्तम सोहराब नागरवाला के घर तक पहुंच गई लेकिन वो वहां नहीं मिला।आखिरकार पुलिस ने उसे एक पारसी धर्मशाला से सारी रकम के साथ गिरफ्तार कर लिया। ये थी पुलिस की कहानी ।

बाद में पुलिस ने उसका एक कंफेशन ऑन कैमरा रिकॉर्ड किया लेकिन पुलिस के पास कोई परिस्थितिजन्य साक्ष्य नही थे और 10 मिनट की सुनवाई के बाद ही कोर्ट ने उसको चार साल की सजा और एक हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुना दी। ये कोर्ट का सबसे तेज ट्रायल था ।

उसके बाद नागरवाला ने जेल से एक पिटीशन लगाई उसके केस की दोबारा सुनवाई के लिए लेकिन शर्त के साथ कि उसी जज की कोर्ट में सुनवाई ना हो लेकिन अक्टूबर 28, 1971 को उसकी पिटीशन रिजेक्ट कर दी गई। फिर उसने दूसरी पिटीशन नवंबर 16, 1971 को लगाई कि जब तक वेद प्रकाश मल्होत्रा से सुनवाई और पूछताछ पूरी ना हो जाए, उसके केस की कार्यवाही आगे ना बढ़े। उसके बाद 20 नवम्बर 1971 को इस केस की जांच करने वाले इंस्पेक्टर कश्यप की उस वक्त रहस्यमयी कार एक्सीडेंट में मौत हो जाती है। उसके बाद नागरवाला कंरट मैगजीन के पारसी एडीटर डीएफ कारका को संदेश भिजवाता है कि उसका इंटरव्यू लिया जाए क्योंकि उसके पास काफी कुछ है बताने को। डीएफ बीमार थे, वो अपने एक सहयोगी को भेजते हैं लेकिन रुस्तम उस सहयोगी को ये कहके साक्षात्कार देने से मना कर देता है की वो सिर्फ एडिटर को ही सब कुछ बताना चाहता है । ऐसे में 1972 के फरवरी महीने की शुरूआत में नागरवाला बीमार होता है तो उसे तिहाड़ जेल के हॉस्पिटल में एडमिट कर दिया जाता है। वहां से उसे जीबी पंत हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया जाता है। 21 फरवरी की ताऱीख थी वो. कुछ दिनों के इलाज के बाद 2 मार्च को उसका जन्मदिन होता है, उसी दिन लंच करने के बाद अचानक वो बेहोश हो जाता है और 2 बजकर 15 मिनट पर डॉक्टर उसे उसके 51 जन्मदिन पर मरा हुआ घोषित कर देते हैं। ऐसे तो नागरवाला की मौत के साथ ही इस केस पर परदा पड़ जाता है ।

लेकिन साक्ष्यों के आधार पर एक कहानी जो नजर आती है वो ये है :

1971 में, भारत सरकार ने महसूस किया था कि बांग्लादेश के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ युद्ध अनिवार्य था। मुक्ति वाहिनी स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण शिविर पूरे देश में विशेष रूप से पूर्वी पाकिस्तान के साथ सीमा के साथ स्थापित किए गए । मई में 21 वर्षीय गुरिल्ला नेता टाइगर सिद्दीकी अपने 10,000 लड़कों को प्रशिक्षण के लिए लाया । मुक्ति वाहिनी सैनिकों द्वारा गुरिल्ला गतिविधि को बढ़ा दिया गया । उन्हें हथियारों और गोला बारूद की आवश्यकता थी और उन्हें पैसे की जरूरत थी । नागर वाला जो कि ख़ुद ब्रिटिश सेना के खुफिया विभाग में काम कर चुका था, उसे बांग्लादेश के साथ समन्वय करने वाले खुफिया विभाग में भेज दिया गया। वह जल्द ही सबसे भरोसेमंद कूरियर बन गया। उसे राशि इकट्ठा करने और कलकत्ता तक सीधे उड़ान भरने के लिए अधिकृत किया गया था।

पैसो की तत्काल जरूरतों को सिर्फ टेलीफोन वार्ता द्वारा ही बताया जा सकता था । मल्होत्रा ​​बैंक में एकमात्र अधिकारी था जो गुप्त निधियों को संभालने का हकदार था। यह खुफिया एजेंसियों सहयोग के कारण ही वह प्रधान मंत्री राहत निधि समिति में भी रखा गया था। मल्होत्रा ​​नागरवाला को पहले से जानते थे और संभवतः उन्हें पहले भी कई बार पैसे दिए थे ।

वास्तव में क्या हुआ था कि जब मल्होत्रा ​​परंपरा के रूप में, वाउचर इकट्ठा करने गए थे , खुफिया प्रक्रियाओं से अनजान डिप्टी चीफ कैशियर रावल ने मल्होत्रा ​​के 1.5 घंटे से लापता होने पर चिंतित होकर होकर रिपोर्ट दर्ज कराई । शिकायत एक बहुत ही जूनियर अधिकारी द्वारा दर्ज की गई थी और पूरे शहर में जंगल की आग जैसे फैल गई थी। मीडिया तक भी बात आ चुकी थी ।अधिकारियों के पूरे मामले को खत्म करने में बहुत देर हो चुकी थी।

नागरवाला हमेशा आपातकालीन निर्देशों के लिए वॉकी-टॉकी रखता था । उसे एक निशान छोड़ने का आदेश दिया गया था ताकि जरूरत पड़ने पर उसके वरिष्ठ अधिकारी उससे सम्पर्क कर सके । उनका बहुत आधुनिक रिवॉल्वर भी दी गई थी।

नागरवाला ने सोचा था कि वह किसी भी तरह से मुक्त तो हो ही जाएगा । उसका जेल जाना उसके लिए एक झटका था । वह उच्च न्यायालयों में गया तथा फिर से मुकदमा चलाने की मांग की जिससे सरकार घबरा गई। नागरवाला सारे ख़ुफ़िया विभाग की पोल खोलना चाहता था । उसने अपने वकील आर.सी माहेश्वरी को पत्र लिखा जिसमे उसने ने उन्हें कुछ दबे रहस्य बताने का वादा किया था लेकिन इसी बीच नागरवाला की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई ।

अब जांच की आधिकारिक विसंगतियों और किन सवालो के जवाब आज तक नही मिल पाए उनको देखते है

1 = माना जाता है कि आधिकारिक तौर पर नागरवाला ने श्रीमती गांधी की आवाज़ की नकल करके मल्होत्रा को बेवकूफ बनाया ।

2 = नागर वाला के आधिकारिक बयान के अनुसार उन्होंने बिना किसी पूर्व योजना के इस घटना को सोचा और कैशियर को फ़ोन किया ।

3=मल्होत्रा ​​के मुताबिक, जिस कोड को जवाब देना था वह “बांग्लादेश का बाबू” था, जिसमें “BAR AT LAW” टिप्पणी मल्होत्रा को करनी थी।

4= मल्होत्रा ​​का कहना था कि उसने नागरवाला पर विश्वास करके 60 लाख रुपये दिए और उसे बेकार में फसाया जा रहा है ।

5= नागरवाला ने कहा कि कि उसने जानबूझकर पुलिस के लिए लिए सुराग छोड़ा।

6=आधिकारिक तौर पर, पुलिस ने बताया कि शिकायत मल्होत्रा ​​द्वारा दर्ज की गई थी। हालांकि, अदालत के रिकॉर्ड बताते हैं कि “डिप्टी चीफ कैशियर रावल सिंह” द्वारा प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

7=नागरवाला एक पूर्व सेना अधिकारी था और यह एक व्यक्तिगत उद्यम था।

किन प्रश्नों के उत्तर आज तक नही मिले है उनको भी देख लेते है

1= नागरवाला चेहरे के पक्षाघात से पीड़ित था और उसे एक बड़ी भाषा सम्बन्धी बीमारी भी थी । फिर वह इतनी ईमानदारी से आवाज़ की नकल कैसे कर सकता था जबकि मल्होत्रा ​​ने दृढता पूर्वक ये कहा था कि वह श्रीमती गांधी की आवाज़ थी । वह श्रीमती गांधी की टेलीफ़ोनिक आवाज से अच्छी तरह परिचित थे । मल्होत्रा ​​प्रधान मंत्री के घर के नियमित आगंतुक थे और प्रधान मंत्री के राष्ट्रीय राहत निधि और नागरिक परिषद में उनके साथ निकटता से जुड़े थे। कोई बिना पहचान के प्रधान मंत्री को “माताजी” के रूप में संबोधित तो नहीं करेगा ।

2 =क्या इतनी बड़ी रकम निकलने के लिए प्रबंधक को फ़ोन करना स्वाभाविक नही होता ? मल्होत्रा ​​को इतनी बड़ी रकम स्वतंत्र रूप से निकालने का क्या अधिकार था?

3=नागरवाला के कॉन्फेशन में कहा था कि कि कूरियर मल्होत्रा ​​से पूछेगा- “आप किस देश का बाबूजी”? इसका जवाब “भारत का” होगा। कूरियर बदले में ” मैं बांग्लादेश का बाबूजी” कहेंगे। जबकि मलहोत्रा के बयान में कुछ और कहा गया था ।

4= एक अनुभवी कैशियर के रूप में, मल्होत्रा ​​को पता था कि वह सभी बैंकिंग कानूनों और प्रक्रियाओं को खारिज कर रहा था। क्या उसने कभी इस तरह पहले भी पैसा निकाला था? किस खाते से धन निकाला गया और बाद में जमा किया गया था? क्या स्टेट बैंक उचित रसीद, वाउचर या चेक़ के बिना बड़ी रकम निकलने देता था ?

5 = यह कैसे हुआ कि उसने सफलतापूर्वक अपने रास्ता डेढ़ घंटे में पूरा कर लिया ? क्या यह एक संयोग है कि उसने पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करने के कुछ ही समय बाद उन्होंने टैक्सी ड्राइवर पर विश्वास करना शुरू कर दिया था । क्या सच मे मल्होत्रा खुद ​​प्रधान मंत्री आवास में गए थे ?

7= रावल सिंह ने शिकायत दर्ज की थी जब मल्होत्रा ​​प्रधान मंत्री से वाउचर लेने के लिए कथित तौर पर यात्रा कर रहे थे । क्या मल्होत्रा ​​को पुलिस द्वारा मजबूर किया गया था और बाद में उसके नाम पर शिकायत दर्ज की गई थी?

8= क्या यह सच था कि बांग्लादेश संकट के दौरान नागरवाला एक कूरियर और सेना-बीएसएफ-रॉ गठबंधन खुफिया योजना के लिए एक प्रशिक्षण अधिकारी था? हालांकि वह स्नातक भी नहीं था पर उन्होंने दावा किया कि उन्होंने लगभग पांच वर्षों तक एक जापानी शैक्षिक संस्थान में अंग्रेजी पढ़ाया है। क्या वह जापान में भारत।की तरफ़ से भेजा गया था? इस तथ्य से पुष्टि की गई है कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद, उन्होंने प्रधान मंत्री या बीएसएफ महानिदेशक से बात करने की अनुमति मांगी थी जो तब नागरवाला के पुराने परिवारिक मित्र श्री रूस्तमजी थे।

पुलिस और कोर्ट ने इस मुद्दे को ज्यादा समय भी नहीं दिया। उसके बाद इस केस से जुड़े बैंक और पुलिस कर्मचारियों की जैसे एक एक करके संदिग्ध मौत हुई और खुद नागरवाला की मौत ने इंदिरा गांधी को संदेह के घेरे में ला दिया ।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इंदिरा सीक्रेट मिशन के नाम पर बिना किसी कागजी कार्यवाही के निजी इस्तेमाल के लिए भी ऐसा पैसा निकालती थी । पुलिस के बयान में था कि वेदप्रकाश मल्होत्रा ने एफआईआर करवाई थी, जबकि एफआईआर डिप्टी हैड कैशियर रावल सिंह के नाम से थी । इस बात का आरोप लगा कि जब वेदप्रकाश मल्होत्रा एक घंटे तक नहीं लौटा तो रावल सिंह थाने चला गया और पुलिस अधिकारी एक्शन में आ गए थे । बात मीडिया तक पहुंच गई थी, इसलिए पीएम और हक्सर ने इस मामले से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे । ना केवल पर्सनल इस्तेमाल और गैरकानूनी तरीके के आरोप लगते बल्कि मुक्ति वाहिनी की मदद के आरोप भी लगे जैसा की मैं ऊपर लिख चुका हूँ । ऐसे में कुर्बानी दे दी गई सीक्रेट एजेंट रुस्तम सोहराब नागरवाला की, जिसे रॉ एजेंट तक कहा गया । उसको इस तरह के मिशन के लिए पैसा पहुंचाने का कूरियर एजेंट कहा जाता था और स्टेट बैंक की उस ब्रांच में कैशियर वेदप्रकाश मल्होत्रा को उस तरह के मिशन के लिए पैसा देने की जिम्मेदारी दी गई थी । तभी उसने इतने आसानी से 60 लाख की रकम दे दी । इस मामले को लेकर जनता पार्टी सरकार ने रेड्डी जांच आयोग भी 1977 में बनाया था, लेकिन कोई रहस्य उजागर नहीं हो पाया, क्योंकि केस से जुड़े लोग संदिग्ध मौत का शिकार हो चुके थे. ये राज हक्सर और इंदिरा गांधी के ही सीने में दफन था और उनके साथ ही चला गया.

ये वो कहानी है जो समय के साथ रहस्य बन के रह गई ।

ये थी भारत का सबसे बड़ा चोर की ऊलछी हुई गुथ्थी ।

ये लेखक के अपने विचार हैं।

WRITER and AUTHOR:

RAJ JOSHI  (राज जोशी)

About: In love with Music. Loves to share own personal thought on various political and social issues. It is his passion to share knowledge he has, and also learn about new things on the way.

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Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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