General Reservation in Hindi . सवर्ण आरक्षण ।

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जैसे ही मैंने सवर्ण आरक्षण खबर पढ़ी तो मेरे दिमाग में कई संभावनाएँ आईं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले से ही 50% की सीमा लगा रखी है तो ये आरक्षण देने के लिए संविधान में बदलाव करना पड़ेगा। कई संभावनाएँ हैं:

  1. संविधान संसोधन बिल दोनों ही सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास हो जाएगा। हालाँकि, कई लोगों को ये पसंद नहीं आएगा जिनका ये मानना है कि आरक्षण एक अभिशाप है। हो सकता है कि मण्डल कमीशन के समय की तरह फिर से विरोध देखना पड़े।
  2. स्थानीय पार्टियाँ भी अपने अपने राज्यों में आरक्षण बढ़ाने की बात करेंगीं। जाति फिर से एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। अगर संसोधन हुआ तो कक्षेत्रीय पार्टियाँ बाकि जातियों को आरक्षण देने में पीछे नहीं हटेंगी।
  3. सुप्रीम कोर्ट बीच में दखल दे सकता है और इस संसोधन को ख़ारिज कर सकता है। पहले भी मण्डल केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ तौर पर आरक्षण को सिर्फ सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर देने की बात करी है।
  4. हो सकता है कि बिल पास ना हो। ऐसे में वर्तमान सरकार विपक्ष पर आरोप लगा सकती है कि वो सवर्ण विरोधी है।
  5. जनता की तरफ से विरोध हो सकता है। कई लोग अभी से ये तर्क दे रहे हैं कि 10% आरक्षण में सवर्ण क्यों? ऐसे में हो सकता है कि बिल राज्य सभा में अटक जाए।

जो भी हो, ये एक बड़ी घटना है। बीजेपी को इससे नुकसान होने की कम ही आशंका है। लेकिन एक चीज़ जरूर होगी कि जाति-मानसिकता को भारत में फिर से बढ़ावा मिलेगा।


मेरा व्यक्तिगत मत ये है कि आरक्षण को धीरे धीरे हटाना चाहिए, ना की उसे और बढ़ावा देना चाहिए। कुछ सुधार जैसे की दो-तीन पीढ़ियों तक आरक्षण को देना, ज़रूरी है। ये मत कोरा पर मौजूद अफसरों और तमाम ज़मीनी जानकारी रखने वाले लोगों से तर्क कर के बना है। साथ में, मैं पूरी तरह आरक्षण को हटाने के विरुद्ध हूँ।

एक सोचने वाली बात ये भी है कि जो जनरल केटेगरी के लोग 10% की आर्थिक सीमा के ऊपर हैं उनके लिए तो परीक्षाओं में और भी ज्यादा कठिनाई हो जाएगी। उनके लिए तो सिर्फ 40% सीट ही बचती हैं। फिर ये सवर्णों के फायदे की बात हुई या नुकसान?

मैं ये मानता हूँ कि आरक्षण योग्यता को दबाता है। मेरे स्कूल में कुछ मित्र ऐसे थे जिन्होंने जम कर पढाई करी और साथ में अच्छे नंबर लाये, लेकिन उन्हें अच्छे कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिला। हालाँकि, मैं इस बात को भी नहीं अनदेखा कर सकता कि आज भी भारत में मल, मूत्र, कचरा उठाने जैसे कामों को कई जगह कुछ जातियों से जबरन कराया जाता है। छुआ-छूत आज भी जिन्दा है, जैसे आज ही इस खबर में आया है:

आईएएस अधिकारी ने छुआ-छूत के विरुद्ध राजस्थान में कड़े कदम उठाये

अभी भी अंतर-जातीय शादियाँ भारत में एक बड़ा हँगामा कर देती हैं। अभी भी ऐसे कई गांव हैं जहाँ निम्नजाति के लोगों को चप्पल पहनना मना है। एक डाक्यूमेंट्री है इस पर, ज़रूर देखें:

अछूत भारत

ये सब देखते हुए आरक्षण हटाना तो एक सपना लगता है। क्योंकि ना तो ऐसे लोगों को सरकार विकास कार्य से जोड़ पायी है, ना ही ये किसी स्कीम का लाभ उठाने लायक है। आरक्षण का तर्क, दबे-कुचले सामाजिक वर्ग को शिक्षा और रोजगार से ऊपर उठाना, अभी भी सही बैठता है। इन लोगों को असल में आरक्षण की जरूरत है। इसलिए आरक्षण को एकदम से हटाना भी गलत होगा।

मैं इस तर्क को नहीं स्वीकार कर पा रहा हूँ की सवर्ण आरक्षण बढ़ाने से हिन्दू एकता आएगी। जितना मैंने भारत के समसामयिक इतिहास को जाना है, आरक्षण देने से और भी ज्यादा आरक्षण की माँग होगी। और ये इस समय बहुत ही ज़्यादा खतरनाक होगा।

इस समय दुनिया में चौथी औद्योगिक क्रांति की बात हो रही है। ऐसे में हमें कुशल और प्रतिभाशाली लोगों की आवश्यकता होगी। लेकिन आरक्षण से इस कार्य में बहुत अड़चनें आएँगी। बेहतर होता की सरकार इसे धीरे धीरे कम करने के लिए कुछ उपाय करती।

इस समय आरक्षण-नीति का मूल्यांकन करने के लिए एक समिति की बहुत आवश्यकता है। ऐसी समिति से हमें पता लगेगा कि ये नीति कितनी कारगर है और इसमें क्या सुधार चाहिए। लेकिन आरक्षण बढ़ाने जैसी बात मुझे हानिकारक लग रही है। आशा है कि ऐसे क़दमों से हमारे बीच जातिवाद और नहीं बढ़ेगा।

जय हिंद!

ये लेखक के अपने विचार हैं।

WRITER and AUTHOR:

 General Reservation in Hindi

©Pranjul Yadav, Writer on Quora

About: Knows about economics, constitution and religion. Not associated with any political party . Gives more importance to facts in politics.

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Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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