ISKCON Organisation in Hindi . इस्कॉन संस्थान ।

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इस्कॉन को समझने के लिए हमें आज़ादी के पहले के भारत में जाना होगा। तो चलिए समय का पहिया घुमाते हैं।

बात सन 1922 में कलकत्ता की है। अभय चरण बाबू को उनके मित्र बोलते हैं कि शहर में एक अनोखा सन्यासी आया है। चलो उसको देखने चलते हैं। अभय हिचकिचाते हैं। उन्होंने बचपन से कई बाबा, सन्यासी, योगी देख रखे होते हैं। वो जानते थे की आज के युग में सच्चा साधू मिलना लगभग नामुमकिन है। फिर भी, दोस्त का मन रखने के लिए वो उस सन्यासी के सत्संग में जाते हैं।

अभय बाबू जब अंदर पहुँचते हैं तो देखते हैं कि एक जवान सन्यासी गेरुए रंग के कपड़े पहने बैठे है। उस सन्यासी ने चश्मा लगा रखा है और वो बिना किसी पुस्तक के लंबे चौड़े व्याख्यान दे रहे हैं। उनके मुख मंडल से तेज़ निकल रहा है। अभय बाबू बड़ी ध्यान से उनकी बातें सुनने लगे।

उस सन्यासी ने बताया कि इस भौतिक जगद के बाहर भी एक आध्यात्मिक जगद है। हमें उस जगद में जाने का प्रयास करना चाहिए और ये भारतवासियों का कर्तव्य है कि वो गीता का ज्ञान सारी दुनिया में पहुँचाये। उन्होंने अभय बाबू की और देखा और बोला, “आप तो पढ़े लिखे नौजवान लगते हैं। क्या आप भारत के इस अनमोल ज्ञान को संसार में नहीं फैलाना चाहेंगे?

अभय थोड़ा संकोच में थे। वो उस समय गाँधी के विचारों से प्रभावित थे। सुभाष चंद्र बोस उनके स्कूल में ही पढ़ते थे और क्रांति की बातें करते थे। उन्होंने तर्क दिया, “महाराज, आपको नहीं लगता की भारत को पहले आज़ाद होना चाहिए और फिर ये सब सोचना चाहिए?”

इस पर वो सन्यासी बोले, “भागवद ज्ञान किसी भी भौतिक परिस्थिति के प्रभाव में नहीं आता। भारत गुलाम है तो क्या हुआ, कल को वो आज़ाद होगा। लेकिन गीता का संदेश अगर इस समय दुनिया में नहीं पहुँचाया गया तो विनाश होगा।

ये वो समय था जब एक विश्व युद्ध तबाही मचा चूका था। दूसरे विश्वयुद्ध के होने की भी आशंका थी। अभय बाबू को उस सन्यासी के तर्क ने जीत लिया था। उन्होंने मन ही मन उन्हें अपना गुरु मान लिया। वो सन्यासी दरअसल भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर थे।

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उस दिन अभय बाबू जब घर वापस आये तो वो बदले हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था जैसे किसी को बचपन का कोई खोया हुआ खिलौना वापस मिल गया हो। अभय समझ चुके थे की उनके जीवन का लक्ष्य क्या था। उनके भीतर का भागवद-ज्ञान अब स्वतः ही बाहर आ रहा था। उन्होंने निर्णय किया कि वो अपने गुरु की इच्छा को पूरा करने की कोशिश करेंगे।

जल्द ही अभय बाबू ने एक मैगज़ीन निकाली जिसका नाम था “बैक टू गॉडहेड”। उन्होंने पढ़े लिखे समाज को ये समझाने की कोशिश करी की भौतिक जगद से ऊपर उठो और अध्यात्म की और बढ़ो। उन्होंने एक संगठन भी बनाया जिसका नाम था “लीग ऑफ़ डिवोटीस”। लेकिन वो नाख़ुश थे क्योंकि अभी भी उनके गुरु का सपना अधूरा था।

इसी तरह कई साल बीते। अब आता है सन 1965। एक बूढ़ा सन्यासी विनती कर के अमेरिका जाने वाले मालवाहक समुद्री जहाज़ में जाने की टिकट ले लेता है। ये सन्यासी अभय बाबू ही थे, लेकिन अब वो भक्तिवेदांत स्वामी के नाम से जाने जाते थे। बिना किसी पूँजी के, कुछ श्रीमद भागवद की प्रतिलिपियाँ और एक जोड़ी कपड़े लिए वो उस जहाज़ पर चढ़े। लोगों ने चिंता जताई की स्वामी जी अमेरिका में कैसे जियेंगे? कुछ ने कहा कि कहीं उनकी मृत्यु न हो जाए। लेकिन स्वामी जी के मन में अपने गुरु की आज्ञा और दिल में कृष्ण के लिए प्रेम था।

जहाज़ में कई दिक्कतें हुईं। स्वामी जी को दो दिल के दौरे पड़े। वो मन ही मन कृष्ण से प्रार्थना कर रहे थे की आप ही मेरा सहारा हो। इस बूढ़े सन्यासी का कृप्या साथ दें। उस रात उनके सपने ने कृष्ण आये। उन्होंने आश्वाशन दिया की मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा। स्वामी जी भगवान के प्रेम को देख कर स्वतः रोने लगे।

जब स्वामी जी अमेरिका के बोस्टन तट पर उतरे तो वो अमेरिका की संस्कृति को देख कर चिंतित हुए। उन्होंने एक कविता लिखी जिसमे उन्होंने कहा:

हे कृष्ण! यहाँ के लोग तो कलियुग के साए में चैन से सो रहे हैं। मुझ जैसे सन्यासी के बोलने से क्या ये कुछ सुनेंगे? मैंने तो अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया क्योंकि गुरु-वचन को भगवान की वाणी बोलते हैं। अब मैं आपके हाँथ की कठपुतली हूँ । आप जैसा चाहे मुझे नचाये। यह बूढ़ा भिखारी बस आपसे यही भीख माँगता है।

फिर कुछ समय बाद स्वामी जी ने अमेरिकी नशेबाज़ों, हिप्पियों और ड्रग के लती लोगों के बीच कृष्ण कीर्तन करना चालू किया। क्योंकि स्वामी जी भौतिक रूप से गरीब थे तो अमीर वर्ग ने उन पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब हिप्पी उनकी बातें सुन कर नशा, व्यभिचार, और माँस खाना छोड़ने लगे तो अमेरिका के होश उड़ गए। एक बूढ़े स्वामी ने वो कर दिखाया जो सरकार नहीं कर पाई थी। सभी इस भारतीय स्वामी के कारनामे को देख के नतमस्तक हो गए।

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फिर, अपने गुरु की आज्ञा पूरी करने के लिए स्वामी जी ने इस्कॉन की स्थापना करी। धीरे धीरे “हरे कृष्ण महामंत्र” हर घर में फ़ैल गया। बड़े बड़े संगीतकार, दार्शनिक, वकील, धर्मशास्त्री, राजनायक और नेता उनसे मिलने आने लगे। इस्कॉन, स्वामी प्रभुपाद के नेतृत्व में फलने-फूलने लगा। इसने दुनिया में सैकड़ो मंदिर खोले, आश्रम खोले और लाखों लोगो को हरि नाम से परिचित कराया। उन्होंने पुरी, ओडिशा में होने वाली जगन्नाथ यात्रा को संपूर्ण दुनिया में कराया।

लेकिन फिर इस्कॉन को झटका लगा। स्वामी प्रभुपाद इस दुनिया को छोड़ कर जा चुके थे।

कुछ एक खबरें आई की इस्कॉन में गलत लोंगो ने कब्ज़ा कर लिया है। वो समय इस्कॉन भक्तों के लिए सबसे ज़्यादा दुःखदायी था। उनके प्रिय गुरु के जाने के बाद ऐसा लग रहा था कि सब समाप्त हो जाएगा। लेकिन इस्कॉन ने ख़ुद को सम्हाला।

इस्कॉन से कुछ एक गलतियाँ हुई हैं। ऐसा इस्कॉन में रहने वाले लोग भी जानते हैं। और ये अपेक्षित था क्योंकि कोई भी संस्थान हमेशा सिर्फ अच्छे लोगो से नहीं बनी होती है। कुछ एक बुरे लोग भी आ जाते हैं। लेकिन फिर भी, इस्कॉन ने महत्वपूर्ण कार्य ज़ारी रखे। आज ‘अक्षय-पात्र’ नामक संस्था से वो देश में लाखों बच्चों को मुफ़्त में मिड-डे मील देते हैं। पिछड़ी आदिवासी जनजातियों में उन्होंने स्कूल खोलने और उनको मुख्यधारा से जोड़ने का काम चालू किया है। और कई इंजीनियर, डॉक्टर, व्यापारी इनके काम से प्रभावित हो कर इसके आजीवन सदस्य बन गए हैं।

इस्कॉन कोई ऐसी संस्था नहीं है जो भारत को आर्थिक रूप से नुक्सान पहुँचाने के लिए बनी है। ये विदेशियों की भी संस्था नहीं है, क्योंकि अब ज़्यादातर मंदिरों में आपको सिर्फ भारतीय मिलेंगे। इसका मुख्यकेंद्र बंगाल और वृन्दावन में है। और ये भारत की संस्कृति को फैलाने के लिए काफ़ी प्रयासरत हैं।

अच्छाइयाँ और बुराइयाँ, दोनों के आँकलन के बाद मुझे ये संस्था अच्छी लगी। कमियाँ हैं लेकिन उसे दूर करने वाले लोग भी हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वो वेदिक संस्कृति को फैलाने और लोकसेवा में काफ़ी आगे हैं। बाकी कांस्पीरेसी थ्योरी तो हर जगह है।

नोट: मैंने इस्कॉन में दीक्षा नहीं ली है लेकिन मैं इनके कार्य से प्रभावित हूँ। मैंने अंग्रेजी कोरा पर इसकी कमियां भी समय समय पर गिनाई है। आशा करता हूँ आप भी इसको सही नज़रिये से देखेंगे।

ये लेखक के अपने विचार हैं।

WRITER and AUTHOR:

 इस्कॉन

©Pranjul Yadav, Writer on Quora

About: Knows about economics, constitution and religion. Not associated with any political party . Gives more importance to facts in politics.

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Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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