Vashishtha Narayan Singh . वरिष्ठ नारायण सिंह ।

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मैं आपको एक ऐसे इंसान के बारे मे बता रहा हूँ जिनके बारे में जानकर मैं बहुत आश्चर्य चकित हो गया था ।

 Great Mathematician Vashishtha Narayan Singh

ये है 76 वर्षीय भारत के महान गणितज्ञ वरिष्ठ नारायण सिंह ( Vashishtha Narayan Singh )जिनके बारे में ये प्रख्यात है की इन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती दी थी । एक वक्त वो भी था जब इस महान गणितज्ञ का लोहा हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसा विकसित देश भी मानता था । उन्होंने अपनी रिसर्च और प्रतिभा से नासा और आईआईटी सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि वह अपने ही शहर में गुमनाम जिंदगी जी रहे है । वर्ष 1977 में उन्हे सीजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी ने जकड़ लिया जिससे वो आज तक मुक्त नहीं हो पाए। आज उनका हाल ऐसा है की गणित के भगवान कहे जाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह को देख के उनके पड़ोसी के आँखों मे भी आँसू आ जाते है ।

बिहार में भोजपुर जिले के निवासी वरिष्ठ नारायण सिंह जी का जन्म 2 अप्रैल 1942 को बसंतपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूल की शिक्षा नेतरहाट विद्यालय से प्राप्त की। वशिष्ठ नारायण सिंह बचपन से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे । वशिष्ठ जी को पटना के साइंस कॉलेज में प्रथम वर्ष में बी.एस सी.ऑनर्स की परीक्षा देने की अनुमति दे दी । उन्होंने 1969 में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया से PhD की उपाधि हासिल की जिसके बाद नासा के एसोसिएट साइंटिस्ट प्रोफेसर के पद पर बहाल हुए। 1971 में वो भारत आये और यहाँ नौकरी करने लगे । नौकरी के तुरंत बाद वर्ष 1973 मे उन्होंने शादी कर ली लेकिन उनका वैवाहिक जीवन कुछ ज्यादा दिन नहीं चला। कुछ वर्षों बाद ही उनकी पत्नी उनसे अलग हो गई।

4 वर्षों के बाद वो अचानक सीजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी से ग्रसित हो गए। जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराया गया लेकिन सही इलाज नहीं होने के कारण वो एक दिन वहाँ से गायब हो गए जिसके बाद उनका कुछ समय तक पता नहीं चला। सन 1993 में लोगो ने उन्हें डोरीगंज में एक पेड़ के नीचे दयनीय अवस्था में बैठे देखा गया। जिसके बाद लोगों ने यह जाना कि यही वशिष्ठ नारायण सिंह है।

 Great Mathematician Vashishtha Narayan Singh

41 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वरिष्ठ नारायण सिंह जी पटना में गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं । अभी भी किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त है। । कहा जाता है कि वो दुनिया की नामी लेखकों की कठिन से कठिन कैलकुलस की किताब वो एक दिन में खत्म कर देते है ।

अमरीका से वह अपने साथ 10 बक्से किताबो के लाए थे, जिन्हें वह आज भी पढ़ते हैं। वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी । उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था । पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र ग़लत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे । बाद में उनकी अलग से परीक्षा ली गई जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए। पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन मुश्किल हालात भी उनकी प्रतिभा और मेहनत को कम ना कर सके । वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में थे तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी । कैली ने वशिष्ठ जी की प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए । साल 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए । कुछ समय नासा में भी काम किया लेकिन 1971 में वो वापस भारत लौट आए । पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई, और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की.

इस बीच 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हो गई । यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला। छोटी बातों पर बहुत ग़ुस्सा हो जाना, कमरा बंद करके दिन भर पढ़ते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था। इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक़ ले लिया । यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था। तक़रीबन यही वक्त था जब वह आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे। कहा जाता है कि कई प्रोफ़ेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया और यह बात उनको बहुत परेशान करती थी। साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज. जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया । अगर उनका इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी लेकिन परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था और सरकार की तरफ से बहुत कम मदद मिल रही थी । सन 1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव वापस लौट आए और 1989 में वो अचानक ग़ायब हो गए । साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए।

डॉ वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर अब नाउम्मीद हो चुका है। घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां अब उनको डराती हैं। डर इस बात का कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा । उनकी भाभी प्रभावती कहती भी हैं, ” हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है । बाक़ी तो यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया।

एक वृध्द आदमी आज भी पेंसिल पकड़े घर का चक्कर काटता है । कभी अखबार , कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी रेलिंग, जहाँ भी उसका मन करे वहाँ लिखता है और शायद कुछ बुदबुदाता है और घर वाले उसे देखते है कभी आंखों में आंसू लेके कभी मुस्कुराते हुए ।

WRITER and AUTHOR:

RAJ JOSHI  (राज जोशी)

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Vijaypal Mishra

Spend 20 years of my life observing politics , society in India. Political and social enthusiast. Also trained in Yoga and meditation in Haridwar, Uttarakhand.

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